अब बस भी कर ज़ालिम, कुछ तो

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अब बस भी कर ज़ालिम, कुछ तो रहम खा मुझ पर,
चली जा मेरी नज़र से दूर कहीं मैं शायर ना बन जाऊं।

ये तो बस वही जाने जिसके दिल पर गुजरी हो,
तू क्या जाने दिल के दर्द और आंसुओं का रिश्ता क्या है…

प्यास ऐसी के पी जाऊं समंदर सारे,
नसीब ऐसा के मौजूद ज़हर तक नहीं…

ये ज़मीन की फितरत है के हर चीज़ को सोख लेती है,
वरना तेरी याद में गिरने वाले आंसुओं का एक अलग समंदर होता

 

 

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